किसने सोचा था कि ऐसे भी दिन आएँगे..
आम का मौसम होगा और हम गुठलियों को तरस जाएँगे,
न cold coffee, न milk shakes, न ice creams ही जमाएँगे..
किसने सोचा था कि ऐसे भी दिन आएँगे..
मुलाक़ातें न होंगी यारों से, हम अक़ेले ही peg बनाएँगे,
छुट्टियाँ तो ढेरों होंगी, बस हम मना नहीं पाएँगे..
किसने सोचा था कि ऐसे भी दिन आएँगे..
Hill stations सब ख़ाली होंगे और अपनी तरफ़ बुलाएँगे,
रास्ते भी ख़ाली होंगे मगर, हम जा कहीं नहीं पाएँगे..
किसने सोचा था कि ऐसे भी दिन आएँगे..
गाड़ियाँ सब खायेंगी धूल, सब्ज़ी हम पैदल लाएँगे,
हवा हो जाएगी साफ़, हम फिर भी mask लगाएँगे..
किसने सोचा था कि ऐसे भी दिन आएँगे..
सोचा तो नहीं था, पर ये पल आ ही गिरे हैं झोली में तो -
हम भी थोड़ा ठहर जाएँगे..
कुछ खुद पे वक्त बिताएँगे..
कुछ गाएँगे, गुनगुनाएँगे..
और Dalgona Coffee भी बनाएँगे...
गुज़र तो आंधियाँ भी जाती हैं और बड़े बड़े तूफ़ाँ भी,
ये पल भी धीरे धीरे गुज़र ही जाएँगे..
ये पल भी धीरे धीरे गुज़र ही जाएँगे...
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