दिन होता है कब रात हुई?
कब धूप छाँव बरसात हुई?
तू फँसा रहा deadline में..
यार, ये भी कोई बात हुई?
ना शुरू हुई, ना बंद होगी - ते
तो, थोड़ा रुक जा.. ठहर जा.. जी
पैसे के पीछे भाग रहा,
तू दिन में - रात में जाग रहा..
रिश्तों को ताक़ पे रखा है,
यारी को बस WhatsApp रहा..
पैसा तो आता जाता है, chill मार, लड़ा ले जाम से.
थोड़ा रुक जा.. ठहर जा.. जी ले
कुल चार पहर तो जीना था,
तू सोच ज़रा जज़्बातों से..
बचपन वाली अब सुबह नहीं,
दिन फिसला जाता हाथों से..
इससे पहले कि रात आए - कुछ बातें कर ले शाम से.
थोड़ा रुक जा.. ठहर जा.. जी ले
जो होगा देखा जाएगा, तू डर मत अ
बस.. थोड़ा रुक जा.. ठहर जा.. जी ले थोड़ा आराम से!!!