Alfaaz!!!
Tuesday, March 22, 2022
Kuchh bol mat...
Thursday, February 17, 2022
Shikari...
No Offence to Vegetarian folks out there. लेकिन रूपक को समझिये -
शिकार करना - दौड़ना / लड़ना / गिरना / चोट खाना फिर कुछ achieve करना. Basically, मुश्किल रास्ता अपनाना.
शाकाहारी होना - पका पकाया फल तोड के खा लेना. Basically, आसान राह पकड़ना.
Moreover, उसके बाद moral high ground लेना की 'हम तो शाकाहारी हैं, मॉस मच्छी को हाथ नहीं लगते'... तुम शाकाहारी इसलिए बने क्यों कि तुमसे शिकार हुआ नहीं. तुमने आसान राह पकड़ ली.
या फिर 'हम तो IT वाले हैं, सरकारी बाबुओं की तरह under the table नहीं लेते'... तुम under the table इसलिए नहीं लेते हो, क्यों की तुमको under the table कोई देता नहीं. तुम्हे मौका ही नहीं मिला under the table का.
हिन्दू-मुस्लिम करते करते
जन्मा जब बंटवारा था,
रघुपति राघव गाते गाते
गाँधी को उनने मारा था,
जो कभी मस्जिद तोड़ने गए थे, वो आज पुजारी हो गए.
जो ख़राब शिकारी थे वो शाकाहारी हो गए..
सरकार को गाली देते थे
सिस्टम को बदलने वाले थे
इस देश का कुछ न होना है
हर सिस्टम में ही जाले थे
सिस्टम की दुहाई दे देके, इक दिन वो खुद सरकारी हो गए.
और जो ख़राब शिकारी थे वो शाकाहारी हो गए..
आसमाँ से आगे जाना था
हर काम मगर अर्धागी था
हर किसी के मन में बागी था
अंदर से एक विरागी था
पर, जो बग़ावत कर न सके, वो आज्ञाकारी हो गए ..
और जो ख़राब शिकारी थे वो शाकाहारी हो गए ..
जो रोज़ नचाये जाते थे ,
जोकर कहलाये जाते थे..
छुट्टी - पैसे के लालच में
जो तलवे तक खा जाते थे..
कल खुद नाचे, आज मदारी हो गए,
जो ख़राब शिकारी थे वो शाकाहारी हो गए.
ख़ून पसीना बहाना था,
चैन की रोटी खाना था...
जो मुट्ठी बाँध के आये थे,
वो मुट्ठी खोल के जाना था,
इस भौतिकवादी दुनिया में, गुरु तुम भी भ्रष्टाचारी हो गए..
अरे तुम तो शिकार कर सकते थे ना,
फिर तुम क्यों शाकाहारी हो गए?
फिर तुम क्यों शाकाहारी हो गए?
Tuesday, November 3, 2020
Take it easy.. आराम से!!!
दिन होता है कब रात हुई?
कब धूप छाँव बरसात हुई?
तू फँसा रहा deadline में..
यार, ये भी कोई बात हुई?
ना शुरू हुई, ना बंद होगी - ते
तो, थोड़ा रुक जा.. ठहर जा.. जी
पैसे के पीछे भाग रहा,
तू दिन में - रात में जाग रहा..
रिश्तों को ताक़ पे रखा है,
यारी को बस WhatsApp रहा..
पैसा तो आता जाता है, chill मार, लड़ा ले जाम से.
थोड़ा रुक जा.. ठहर जा.. जी ले
कुल चार पहर तो जीना था,
तू सोच ज़रा जज़्बातों से..
बचपन वाली अब सुबह नहीं,
दिन फिसला जाता हाथों से..
इससे पहले कि रात आए - कुछ बातें कर ले शाम से.
थोड़ा रुक जा.. ठहर जा.. जी ले
जो होगा देखा जाएगा, तू डर मत अ
बस.. थोड़ा रुक जा.. ठहर जा.. जी ले थोड़ा आराम से!!!
Saturday, June 27, 2020
Mauka abhi hai...
पतंगे घुस भी आए तो, क्या पता ख़ुशबुएँ लाएँ.. क्या पता गुनगुना जाएँ.
तू पर्दे क्यूँ गिराता है कि कीड़े काट ना खाएँ
वो कीड़े आ भी जायें तो, क्या पता रोशनी लाएँ.. क्या पता आतिशी छाए.
दरीचे क्यूँ लगाता है कि भँवरा दे ना दे दस्तक
वो भँवरा आ भी जाए तो, तितलियाँ साथ आ जाएँ.. क्या पता रंग भर जाएँ.
क्या पता ये भी हो जाए, क्या पता वो भी हो जाए
पता चल पाएगा कैसे, जब तलक तू नहीं चाहे...
वो दिन भी पास ही होगा, तू अंतिम श्वास में होगा
यही खिड़की यही पर्दा दरीचा भी, यही होगा.
नहीं होगा तो ये मौक़ा जो तेरे पास है अब तक
अधूरी ख़्वाहिशें होंगी, ये साला वक़्त नहीं होगा..
इसलिए आज ना ख़ुद को रोक़, ख्वाहिशों को मत मन में घोंट
जो करना है तू कर ले आज, ये सब कुछ कल नहीं होगा
ये इच्छाशक्ति नहीं होगी, ये बाहु बल नहीं होगा
जो करना है तू कर ले आज, ये मौक़ा कल नहीं होगा...
ये मौक़ा कल नहीं होगा...
Saturday, May 30, 2020
Socha na tha...
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